निम्न पंक्तिया यही दर्शाती हैं-
"एक ख़ुशबू आती थी, मैं भटकता जाता था|
रेशमी सी माया थी, और मैं तकता जाता था|"
पर जब वो इस ख़ुशबू में खो जाता है तो उसे एहसास होता है की यह तो उसमे पहले से ही मौजूद थी, जिसे वो जान कर भी अनजान था| वह ईश्वरीय शक्ति (Divine Force) ही है जो उसे स्वयं का खुद से परिचय करवाती है| पर मज़े की बात तो यह है की वो उसमे पहले से थी; देर थी तो बस झाँकने की-
"जब तेरी गली आया, सच तभी नज़र आया|हमारे साथ यह बहुत बड़ी समस्या है कि हम ईश्वर की असीमितताओं को अपनी सोच की सीमाओं में समेटने की कोशिश करते हैं| हर मनुष्य, हर धर्म, हर पंथ यही सोचता है कि ईश्वर सिर्फ वैसा ही है जैसा की वह सोचते हैं| निस्संदेह वह वैसा भी है परन्तु "वैसा ही " नहीं| नतीजतन, वह हमारे सामने, बल्कि सामने ही क्यों हमारे अन्दर मौजूद होता है और हम अज्ञानतापूर्वक आँखें बंद करके यह मान लेते हैं कि- "ना जी! यह ईश्वर कैसे हो सकता है?"
मुझमे ही वो ख़ुशबू थी, जिससे तूने मिलवाया||"
"जब तू रूबरू आया, नज़रें ना मिला पाया|
सर झुका के इक पल में मैंने क्या नहीं पाया|"
दुनिया में असंख्य बातें, लोग तथा घटनाएं हैं और हमारी दैन्दिनी में हमारा सामने उनसे ही होना है| पर ज़रा यह सोचें कि अगर हम उस परवरदिगार को ही अपना प्रेमी बना लें और इस बात को समझे कि वो हमारे अन्दर बाहर, सर्वत्र, हर जगह है तो क्या वह, हमारे इश्क से बंधा हुआ, हमारे लिए इस माया को नहीं सम्भाल सकता? यही तो इश्क का सच्चा मतलब है|
तो कहिये? क्या आप तैयार हैं? "प्रेम" में डूबने के लिए?ऐसे प्रेमी के प्रेम में जिसके लिए महेंगे उपहार, गाड़ी पे घुमाने आदि की कोई ज़रूरत नहीं| जो आपसे कुछ और नहीं चाहता सिवाय सच्चे इश्क के| और जो आपको कभी धोखा ना देते हुए हमेशा साथ निभाएगा?
ज़रा सोचियेगा! :)
आपका
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J












